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🌊 एल नीनो और ला नीना 2025: क्यों आने वाली सर्दी होगी 110 सालों में तीसरी सबसे ठंडी?

एल नीनो और ला नीना: दुनिया इस समय एक बड़े जलवायु परिवर्तन (Climate Transition) के दौर से गुजर रही है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, 2025 की सर्दी पिछले 110 वर्षों में तीसरी सबसे ठंडी सर्दी हो सकती है।
इस परिवर्तन के पीछे दो मुख्य जलवायु घटनाएँ हैं — एल नीनो (El Niño) और ला नीना (La Niña)
इन दोनों का असर न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया के मौसम पर पड़ता है।

एल नीनो और ला नीना के प्रभाव से 2025 की सर्दी होगी अब तक की सबसे ठंडी सर्दियों में से एक।

🌡️ एल नीनो और ला नीना क्या हैं?

एल नीनो और ला नीना प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) के तापमान में बदलाव से जुड़ी दो विपरीत जलवायु घटनाएँ हैं।
ये दोनों El Niño–Southern Oscillation (ENSO) चक्र का हिस्सा हैं।

🔹 एल नीनो (El Niño):

  • यह तब होता है जब प्रशांत महासागर का सतही तापमान सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है
  • गर्म पानी की वजह से वायुमंडलीय दबाव और वर्षा के पैटर्न में बदलाव आता है।
  • आमतौर पर एल नीनो के दौरान भारत में सूखा, गर्मी और कम बारिश देखी जाती है।
  • सर्दियाँ भी हल्की और छोटी होती हैं।

🔹 ला नीना (La Niña):

  • इसके विपरीत, ला नीना के दौरान प्रशांत महासागर का सतही तापमान सामान्य से ठंडा हो जाता है।
  • यह ठंडा पानी वायुमंडल को भी ठंडा कर देता है, जिससे ठंडी हवाएँ एशिया की ओर बढ़ने लगती हैं।
  • नतीजा — कड़ाके की सर्दी, भारी हिमपात, और लंबे ठंड के दौर

🌀 2025 में क्या हो रहा है? एल नीनो से ला नीना की ओर बड़ा बदलाव

मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि 2024 के दौरान एल नीनो अपने चरम पर था, जिसके कारण भारत में मानसून कमजोर रहा और कई हिस्सों में तापमान सामान्य से अधिक रहा।

लेकिन अब, प्रशांत महासागर तेजी से ठंडा हो रहा है, जो इस बात का संकेत है कि ला नीना की स्थिति मजबूत हो रही है
यह बदलाव सीधा असर डालता है:

  • सर्दियों के आगमन पर
  • ठंडी हवाओं की दिशा और ताकत पर
  • हिमालयी क्षेत्रों में बर्फबारी पर
  • और पूरे एशिया के तापमान पर

यही कारण है कि 2025 की सर्दी बेहद ठंडी, लंबी और अप्रत्याशित मानी जा रही है।

❄️ भारत पर एल नीनो और ला नीना का असर

भारत में मौसम सीधे तौर पर प्रशांत महासागर के तापमान से जुड़ा है।
जब एल नीनो सक्रिय होता है, तो भारत में आमतौर पर गर्मी और सूखा देखा जाता है,
लेकिन जब ला नीना आता है, तो ठंड और बारिश दोनों बढ़ जाती हैं

🔹 एल नीनो का प्रभाव:

  • मानसून कमजोर पड़ता है
  • दक्षिण भारत में सूखा
  • उत्तर भारत में गर्म और हल्की सर्दी
  • समुद्री चक्रवातों की संख्या बढ़ती है

🔹 ला नीना का प्रभाव:

  • उत्तर भारत में कड़ाके की ठंड
  • हिमालय में जल्दी और भारी बर्फबारी
  • मध्य और पश्चिम भारत में तेज सर्द हवाएँ
  • कई बार अत्यधिक वर्षा या ओलावृष्टि

🌨️ 2025 की सर्दी: अब तक की रिपोर्ट क्या कहती है?

मौसम विभागों की रिपोर्ट्स के अनुसार:

  • हिमालयी इलाकों में सितंबर के अंत में ही बर्फबारी शुरू हो चुकी है।
  • लद्दाख, हिमाचल, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर में औसत से 25–30% अधिक ठंड दर्ज की जा रही है।
  • उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में दिसंबर से फरवरी तक लगातार ठंड का दौर बने रहने की संभावना है।
  • विशेषज्ञों का अनुमान है कि तापमान कई जगहों पर 0°C से नीचे जा सकता है

इसलिए, यह सर्दी केवल “ठंडी” नहीं बल्कि कठोर और लंबी होगी।

🚗 पहाड़ी इलाकों की यात्रा क्यों है खतरनाक?

लोग अक्सर सर्दियों में बर्फ देखने के लिए पहाड़ों की ओर निकल पड़ते हैं, लेकिन ला नीना के दौरान पहाड़ी यात्रा बहुत जोखिमभरी हो जाती है।

⚠️ संभावित खतरे:

  1. सड़कों पर भारी बर्फ जमना जिससे वाहन फिसलते हैं।
  2. अचानक बर्फीले तूफ़ान (Snowstorms) से रास्ते बंद हो जाते हैं।
  3. बिजली और नेटवर्क की समस्या, जिससे संपर्क टूट जाता है।
  4. फूड और ईंधन सप्लाई रुक जाती है
  5. तापमान -10°C या उससे नीचे जाने पर हाइपोथर्मिया और फ्रॉस्टबाइट जैसी समस्याएँ हो सकती हैं।

इसलिए, सरकार और पर्यटन विभाग लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि
👉 “केवल पूरी तैयारी के साथ ही पहाड़ी इलाकों में यात्रा करें।

🧤 अगर यात्रा करनी ही है तो कैसे करें तैयारी?

ला नीना से प्रभावित सर्दी में यात्रा के लिए आपको सामान्य कपड़ों से काम नहीं चलेगा।
यहाँ कुछ आवश्यक तैयारियाँ दी गई हैं:

🧳 जरूरी सामान:

  • थर्मल इनर और कई लेयर वाले ऊनी कपड़े
  • स्नो-प्रूफ जूते और वॉटरप्रूफ दस्ताने
  • विंडचीटर और जैकेट
  • टॉर्च, पावर बैंक और एक्स्ट्रा बैटरी
  • ड्राई फूड, बिस्किट, इमरजेंसी रेशन
  • बेसिक दवाइयाँ और फर्स्ट एड किट
  • नेविगेशन ऐप या ऑफलाइन मैप

साथ ही, स्थानीय मौसम विभाग के अलर्ट और रोड कंडीशन लगातार चेक करते रहें।

🌍 वैश्विक असर: दुनिया भी झेल रही है ठंड का कोप

ला नीना का असर केवल भारत तक सीमित नहीं है।

  • अमेरिका और कनाडा में बर्फीले तूफ़ान और ठंड की लहरें बढ़ रही हैं।
  • यूरोप में रिकॉर्ड तोड़ बर्फबारी हो रही है।
  • चीन और जापान में तापमान माइनस 20°C तक पहुँच गया है।
  • ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अमेरिका में सूखा और तापमान असंतुलन देखा जा रहा है।

इससे यह स्पष्ट होता है कि ला नीना वैश्विक स्तर पर जलवायु संतुलन को बदल रहा है

🌏 क्या यह जलवायु परिवर्तन (Climate Change) का संकेत है?

जी हाँ, विशेषज्ञ मानते हैं कि एल नीनो और ला नीना की तीव्रता अब पहले से अधिक बढ़ रही है,
जो यह संकेत देता है कि पृथ्वी का जलवायु तंत्र अस्थिर हो रहा है।

  • महासागर का तापमान सामान्य से ज्यादा उतार-चढ़ाव दिखा रहा है।
  • आर्कटिक बर्फ तेजी से पिघल रही है।
  • ग्लोबल वार्मिंग के कारण मौसम की चरम स्थितियाँ (Extreme Events) बढ़ रही हैं।

इसलिए, 2025 की कड़ाके की सर्दी केवल एक मौसमीय घटना नहीं,
बल्कि मानव-निर्मित जलवायु परिवर्तन का चेतावनी संकेत है।

🔍 भविष्य के लिए हमें क्या सीखना चाहिए?

  1. प्रकृति के संकेतों को हल्के में न लें।
  2. यात्रा से पहले पूरी तैयारी और रिसर्च करें।
  3. एनर्जी कंज़र्वेशन और कार्बन फुटप्रिंट कम करें।
  4. स्थानीय प्रशासन के निर्देशों का पालन करें।
  5. सोशल मीडिया पर दिखने वाले “Snow Reels” के पीछे अंधाधुंध न भागें।

💬 निष्कर्ष: यह सर्दी चेतावनी है, चुनौती भी

2025 की सर्दी केवल मौसम का बदलाव नहीं, बल्कि मानवता के लिए एक परीक्षा है।
ला नीना के कारण आने वाली ठंड हमें यह याद दिलाती है कि
प्रकृति हमेशा शक्तिशाली है और हमें उसके साथ तालमेल बैठाना होगा।

इस सर्दी:

“यात्रा समझदारी से करें,
तैयारी पूरी रखें,
और प्रकृति का सम्मान करें।”

🧭 FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)

एल नीनो और ला नीना में क्या अंतर है?

एल नीनो में प्रशांत महासागर का तापमान बढ़ता है, जिससे गर्मी और सूखा बढ़ता है।
ला नीना में तापमान घटता है, जिससे ठंड और वर्षा बढ़ती है।

क्या 2025 में बर्फबारी सामान्य से ज्यादा होगी?

हाँ, मौसम विभाग के अनुसार हिमालयी इलाकों में औसत से ज्यादा बर्फबारी और लंबी सर्दी की संभावना है।

क्या ला नीना हर साल आता है?

नहीं, यह हर 2–7 साल में एक बार आता है और 9–12 महीने तक सक्रिय रह सकता है।

क्या एल नीनो और ला नीना जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ रहे हैं?

वैज्ञानिकों के अनुसार, ग्लोबल वार्मिंग के कारण इनकी तीव्रता और असर दोनों बढ़ रहे हैं।

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K Kishore

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